प्रेषक : दीपक साहू
आपने मेरी पिछली कहानी
साली ने गाण्ड मारी
पढ़ी होगी। अब उससे आगे की कहानी अगली सुबह से शुरू :
मैं बिस्तर से उठा और बाथरूम की तरफ की बढ़ा ही था कि- दरवाज़ा खोल दीपक, खोल !
अरे यह तो दादा जी की आवाज है !
इतनी देर तक सोते हो? और वो कहाँ है?
कौन? मैंने पूछा।
तुम्हारी साली?
अभी सो रही है।
इतने में फ़ोन आया- मैं मम्मी के साथ आज यहाँ से बाजार जाऊँगी, तुम ऑफिस से वापिस आते वक़्त मुझे ले लेना क्योंकि मम्मी-पापा यहीं से वापिस चले जायेंगे।
मुझसे तो कुछ बोलते नहीं बना- हाँ हाँ ! ठीक है ! बस यही मुँह से निकला।
फिर नित्य क्रियाओं से निवृत होने के बाद देखा कि साली जी अभी भी आराम फरमा रही हैं।
मैंने रसोई में जाकर चाय बनाई और ले जा कर पेश की तो मैडम ने एक प्यार भरी जादू की झप्पी मुझे दे दी।
मैंने कहा- मैं अभी आता हूँ !
मैंने दादा जी को चाय दी और पूछा- आप क्या खायेंगे?
तो बोले- अभी भूख नहीं है ! मैं आज ओरछा जा रहा हूँ ! मुझे कुछ पैसे दे दो !
ओरछा हमारे झाँसी शहर से 18 किमी दूर एक धार्मिक और मनोरम घूमने लायक जगह है, वहाँ हिन्दुओं के अलावा विदेशी भी आते हैं) मैंने उनके हाथ में 500 रुपए दिए और वो चाय पी कर चले गए।
अब मैंने अन्दर जाकर देखा तो साली जी चाय पी चुकी थी।
कपड़े तो हम दोनों ही पहन कर नहीं सोये थे, मैंने तो उठकर बस तौलिया ही लपेटा था।
तो बस अब क्या था मैं तौलिया भी हटा कर बिस्तर में कूद पड़ा।
वो भी बेसब्री से यही चाह रही थी और हम दोनों एक दूसरे में समाने की कोशिश करने लगे ही थे कि इतने में फिर बाहर से आवाज आई- भाभी ! ओ भाभी !
अरे यह तो गुड्डी की आवाज है।
गुड्डी हमारे मोहल्ले की ही लड़की है जिसकी शादी एक गरीब परिवार में हुई थी अब वो अपने पति के साथ हमारे पड़ोस में ही किराये पर रहने लगी थी, मेरी नज़र उस पर काफी दिनों से थी।
तब मुझे याद आया कि गेट खुला ही रह गया था। अभी हम लोग संभल भी नहीं पाए थे कि वो बे तकल्लुफी से अन्दर तक आ गई और हमें उस हालत में देख कर बोली- अरे वाह ! आज तो पांचों उंगलियाँ घी में और सर कड़ाही में है !
मैं यह बात सुन कर अवाक् रह गया, यह मुँह पर हाथ रख कर भागने की जगह यह क्या कह रही है !
तभी उसने खुलासा किया- भाई साहब, औरतों पर मर्द निगाह रख सकते हैं तो औरते भी यह कर सकती हैं। लेकिन मैं तो आज यहाँ मौज करने आई थी मुझे यह मालूम नहीं था कि हमारे माल पर पहले से कोई और हाथ साफ़ कर रहा है।
इससे पहले मैं कुछ कह पाता वो लपक कर बिस्तर में आ गई और बोली- भाई साहब ! आज ऑफिस में कह दो कि तबियत ख़राब है और मेन गेट लगा आओ ! नहीं तो कोई तीसरी आ गई तो जाने क्या होगा आपका?
चलो भाई अब बहुत सर खा लिया आपका ! अब मुद्दे की बात पर आ जाते हैं।
हम तीनों में तय हुआ कि कोई भी शाम छः बजे तक कपड़े नहीं पहनेगा। सबसे पहले गुड्डी ने कपड़े उतार कर अपनी चूत मेरे मुँह पर रख दी और बोली- पहले इसे शांत करो ! साली रो रही है ! चड्डी गीली कर दी छिनाल ने !
और साली जी रात के दूध पर से मलाई उतारकर ले आई और लंड पर लगा कर चूसने लगी।
मेरे दोनों हाथ गुड्डी की दोनों फ़ुटबालों से खेल रहे थे। नीचे साली जी गन्ने का जूस निकालने पर आमादा थी। उधर साली ने एक उंगली गुड्डी की गांड में डाल दी।गुड्डी चिहुंक उठी !
अब साली ने दूसरे हाथ उंगली मेरी गांड में डाल दी।
बड़ा ही हसीन समय था वो ! लग रहा था कि बस इसी तरह यह खेल निरंतर चलता रहे ! लेकिन यह क्या- गुड्डी की चूत ने रसधार छोड़ दी।
वहाँ मेरे पप्पू की बैण्ड बज गई और साली जी दोनों सेहतमंद चीजों को चाट कर साफ़ कर चुकी थीं।
अब मेरी बारी थी, मैंने सबसे पहले गुड्डी की चूत में लंड पेल दिया और साली की चूत में अपनी चारों उंगली डाल दी। दोनों ही जबरदस्त तरीके से गांड मटका मटका का मजे ले रहीं थीं।
मेरा निकलने वाला ही था कि गुड्डी ने अपनी चूत हटाकर मुँह लगा दिया और एक दो तीन चार न जाने कितनी पिचकारी उसके उसके मुँह में समां गई और वो मजे ले ले कर सब पी गई।
अब दो बार झड़ने के बाद मेरी हालत खस्ता हो गई थी, मैंने कहा- चलो अब नवाब और कनीज का खेल खेलते हैं !
वो दोनों बोली- वो कैसे ?
मैंने कहा- आज दिन भर के लिए मैं तुम दोनों के लिए एक नवाब हूँ और तुम दोनों मेरी कनीज हो ! जो मेरा हर हुकुम पूरा करती हो !
तो दोनों एक साथ बोलीं- अब हमारे लिए क्या हुकुम है नवाब साहब?
मैं बोला- सबसे पहले हमारे लिए लजीज नाश्ता तैयार किया जाये !
दोनों बोली- नवाब साहब का हुकुम सर आँखों पर !
और दोनों कुछ देर बाद दूध और ब्रेड लेकर आ गई। नाश्ता करने के बाद तय हुआ कि दोनों कनीज नबाब साहब को स्नान कराएंगी और दोनों ने मुझे बड़ी तसल्ली से चूत चटा चटा कर और लंड चूस चूस कर स्नान कराया।
अब इसके बाद तय हुआ कि दोनों कनीज एक दूसरे की चूत का पानी मोमबत्ती से निकालेंगी और मुझे पिलाएँगी।
कुछ देर बाद दोनों ने एक दूसरे की चूत का बुरा हाल कर रखा था। दोनों थक चुकी थीं और दोनों की चूत से गुलाबी सा पानी टपक रहा था जिसे मैंने अपनी जीभ से मजे ले ले कर चाटा।
कुछ भी कहिये, अगर तसल्ली से मजा लेने को मिले तो इससे अच्छा कुछ हो ही नहीं सकता !
इससे पहले कि दूसरा दौर शुरू होता, मोबाइल पर फ़ोन आया- जल्दी यहाँ आ जाओ ! मेरे पैर में चोट लग गई है।
मैंने पूछा- कैसे?
तो बोली- पैर फिसल गया है !
मैंने कहा- मैं अभी आता हूँ ! जरा कंप्यूटर बंद कर दूँ।
मैंने तुरंत गुड्डी को उसके घर भेजा और साली साहिबा को जिम्मेदारी दी कि सारा घर पहले जैसा कर देना, नहीं तो वो सब कुछ समझ जाएगी।
इसके बाद का सारा हाल बाद में !